चंडी चंडेश्वर धाम

चंडी चंडेश्वर धाम

बलिया जनपद की धरती अतिपावन और धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत संस्कृति की जननी है। यहां पर अनेक स्थान ऐसे हैं, जहां लोगों की आस्थाएं, संरक्षित, पुष्पित पल्लवित होती हैं। ऐसा ही एक स्थान है, बलिया जनपद के इसारी सलेमपुर ग्राम में स्थित "चंडी चंडेश्वर धाम"

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बलिया जनपद की धरती अतिपावन और धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत संस्कृति की जननी है। यहां पर अनेक स्थान ऐसे हैं, जहां लोगों की आस्थाएं, संरक्षित, पुष्पित पल्लवित होती हैं। ऐसा ही एक स्थान है, बलिया जनपद के इसारी सलेमपुर ग्राम में स्थित “चंडी चंडेश्वर धाम”

सदियों पुराना यह मंदिर जनपद के श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है। गांव के एक छोर पर बना यह मंदिर अपनी विशिष्टता की अलग ही कहानी कहता है। मेरे संज्ञान में यह शायद एकमात्र मंदिर होगा जहां देवी स्थान में ही शिवलिंग भी विराज रहे हों। अन्यथा देवी स्थान और शिव मंदिर दोनों अलग अलग ही स्थापित किए जाते हैं।

यह मंदिर से जुड़ी अनेक किंवदंतियां हैं। कहा जाता है कि एक मठ के महंत एक बार यहां बाघ पर बैठ कर आए, तो यहां के महंत जी ने मां चंडी से प्रार्थना की,” हे मां! आप कुछ कृपा करें, मैं तो दीन हीन हूं, मैं उनके सम्मुख कैसे आ सकूंगा?” मां चंडेश्वरी ने भक्त की पुकार सुनी, और पूरा मंदिर ही आगे खिसक गया,बड़े बुजुर्ग आज भी उसके निशान दिखाते हैं।

ऐसी अनेक किंवदंतियां और लोककथाएं प्रचलित हैं, जो श्रद्धालुओं की आस्था को बल देती हैं। श्रद्धालु यहां बड़ी संख्या में मन्नतें मांगने आते हैं, मन्नतें पूरी होने पर फिर शीश नवाने भी आते हैं।

रामनवमी तथा शिवरात्रि पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, और विशाल मेले का आयोजन होता है।

गांव के निवासी प्रख्यात साहित्यकार डॉ० रामसेवक विकल जी ने अपनी पुस्तकों में बताया है कि इतिहासकारों के अनुसार पहले गंगा नदी इस मंदिर से सट कर बहती थीं। नावों के अवशेष भी मिले। कालांतर में नदी की धार बदली और गंगा नदी बलिया जनपद के बिल्कुल किनारे चली गई। आज यहां एक तालाब रह गया है।

चंडी चंडेश्वर धाम आज भी श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है। समय समय पर यहां सत्संग, प्रवचन और साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

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